सिसकियोँ से अब कुछ हंसी निकलने की बारी है
खो गयी है रूह मेरी इस बेजान जिस्म में
ताबूतों से अब ज़िन्दगी निकलने की बारी है
दिल के टुकड़े जो बिखरे पड़े हैं ज़मीन पर कहीं
उनमें अटकी हुई वह आह निकलने की बारी है
जकड़े हुए हैं गुज़रे वक्त के शिकंजों में जो
उन क़दमों को बाहर निकालने की बारी है

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